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गुरुवार, 21 जुलाई 2016

एक बड़ा सवाल जब हासिम अंसारी के इंतकाल पर उसी अयोध्या और रामगढ़ी के महन्त एवम उनके साथ आये हर मंदिर के साधु संतों के आँसू क्यों छलक पड़ें.... क्यों रोकर उन्होंने कहा के हमने अपना एक अच्छा दोस्त और साथी खोदिया....

Posted by Unknown
"ऐ  काश  अपने  मुल्क की ऐसी फ़ज़ा बने
मंदिर  जले  तो  दर्द मुसलमान को भी हो
मस्जिद की अस्मिता पे कोई आँच न आये
ये  फ़िक्र मंदिरों के निगहबान को भी हो.।"

जिस बाबरी मस्जिद और अयोध्या मंदिर के झगड़े
ने आज़ादी के बाद हिन्दू और मुस्लिमों के बीच सबसे
बड़ी खायी का काम किया....
कल उसी बाबरी मस्जिद मुक़दमे के मुख्य वादी हाशिम
अंसारी के जनाज़े में ...मुसलमानों के साथ साथ अयोध्या
के साधू संतों की भी आँखें  क्यों नम थीं....?

एक बड़ा सवाल ...

आख़िर एक मुस्लिम के जनाज़े में ..
वो भी जो पूरी ज़िन्दगी बाबरी मस्जिद मुक़दमे का मुख्य
वादी रहा हो....उसके इंतकाल पर उसी अयोध्या और रामगढ़ी
के महन्त एवम उनके साथ आये हर मंदिर के साधु संतों के
आँसू क्यों छलक पड़ें.... क्यों रोकर उन्होंने कहा के हमने अपना एक अच्छा दोस्त और साथी खोदिया....

                               
क्या वजह होसकती है..?    

नयी पीढ़ी और ख़ासकर
ज़हर उगलने वाले सियासी भेड़ियों को इस बात पर
सोचने की ज़रूरत है....

यही है हमारी तहज़ीब...यही है हमारा हिन्दुस्तान..

इस मुल्क की यही तहज़ीब रही है के अगर किसी जब्बार का इंतकाल होता था तो पड़ोस का गंगादीन तब तक क़ब्रस्तान
में एक किनारे हाथ बांधे खड़ा रहता था जब तक के मय्यत को दफ़ना नहीं दिया जाता था....

इस मुल्क की यही तहज़ीब रही है के जब कोई ज़ुबैदा अपनी ससुराल के लिये रूख़सत होती थी तो अपने बाप के कंधे से लगकर रोना भूल जाती थी लेकिन पड़ोस के अलगू काका से लिपटकर रोना नहीं भूलती थी....

हो सके तो इस तहज़ीब और देश को बचा लो
वरना तुम्हारी आने वाली नसलें तुम्हारी तहज़ीब को
सिर्फ़ इतिहास में पढ़ेंगी....

(नाम आँखों से...ख़ीराजे अक़ीदत)

#shahzadakaleem की कलम से
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