बुधवार, 22 जून 2016

रघूराम राजन (गवर्नर, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया) के मुताबिक़ हमारे देश पर 55 लाख 87 हज़ार 149 करोड़ का कर्ज़ है...।

Posted by Unknown

रघूराम राजन (गवर्नर, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया) के मुताबिक़ हमारे देश पर 55 लाख 87 हज़ार 149 करोड़ का कर्ज़ है...।

जिसका एक साल का ब्याज भरना पड़ रहा है= 4 लाख 27 हज़ार करोड़...।
यानि एक महीने का= 35 हज़ार 584 करोड़...।
यानि एक दिन का= 1 हज़ार 186 करोड़...।
यानि एक घंटे का= 49 करोड़...।
यानि एक मिनट का 81 लाख...।
यानि एक सेकेंड का 1,35,000

अब ज़रा सोचिए! हमारा देश प्रति एक सेकेंड 1 लाख 35 हज़ार रूपये का तो सिर्फ़ पुराने कर्ज़े का ब्याज भर रहा है...।

किसान आत्महत्या कर रहा है क्योंकि उन्होंने अपना ज़मीर बेच दिया है तभी तो हालात से लड़ने के बजाए मौत को चुन रहे हैं... रहा सवाल नेताओं का तो उनका भला कैसा ज़मीर..? बचा ये मुआशरा जो कोल्ड ड्रिंक जैसे ज़हर को ख़रीदते वक़्त तो कोई भाव ताव नहीं करेगा और सब्ज़ी, फल और जितनी भी स्वदेशी चीज़ें हैं उन्हें एक एक पैसा कम कराने की जुगत में रहता है...।

हमारा आज तो गुज़र रहा है लेकिन हमारी नस्लों का आने वाला कल हमारे चुने हुवे नेताओं और हमारे टूटे हुए ज़मीर की वजह से बेकार, बर्बाद व अंधकार में डूबा हुआ रहेगा और इस सब के ज़िम्मेदार हम खुद होंगे...।

हो सकता है कि कुछ लोगों को मेरा ये फिक़्र महज़ एक वाक्य लगे, दुआ करता हूँ कि मैं ग़लत रहूँ इस मसअले पर लेकिन हूँ नहीं ये मैं भी जानता हूँ और आप भी...।

हमारा मकसद किसी पार्टी को टार्गेट करना बिल्कुल नहीं है, क्योंकि अब तक जितनी भी पार्टियों ने राज किया है सबने देश को लूटने का ही काम किया है... सबने आम जनता का खून ही पिया है, कोई न अच्छे दिन ला सका है न ला सकेगा, वजह अपना पेट बस अपना... मीडिया को कैन्सर की बिमारी है, जो राज करेगा उसके तलवे चाटेगी... आगे देश के हालात क्या होने हैं ये किसी लीडर के लिए मायने नहीं रखता...। उन लीडरों की मानसिकता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि सब धर्म की राजनीति करने में लगे हैं, देश का बेहतर कल गया तेल लेने...।

इस हालात पे बाबा (मुनव्वर राना) की एक ग़ज़ल सुनहरे अक्षरों में लिखे जाने योग्य है, जो इस परिस्थिति को साफ़ अल्फ़ाज़ों में आईना बनाकर दिखाती है...

हर एक आवाज़ ऊर्दू को फरियादी बताती है
ये पगली फिर भी ख़ुद को शहज़ादी बताती है

यहाँ पिछले कई सालों से काले नाग रहते हैं
वहाँ एक घोसला चिड़ियों का था दादी बताती है

यहाँ विरानियों की एक मुद्दत से हुक़ूमत है
यहाँ से नफ़रतें गुज़री हैं, बर्बादी बताती है

लहू कैसे बहाया जाए ये लीडर समझते हैं
लहू का ज़ाएका क्या है, ये ख़ादी बताती है

गुलामी ने अभी तक मुल्क़ का पीछा नहीं छोड़ा
हमें फिर क़ैद होना है, ये आज़ादी बताती है...।

Tanveer Tyagi

1 टिप्पणी:

  1. आप जारी रहें सर हर कोई सेांच रहाा है इस बात आपको चिराग जलाये रख्‍ानाा है में भी आपके साथ हूुं

    जवाब देंहटाएं